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सबका साथ खुशियाँ अपार

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मैं एक चौराहा हूँ. 
चौराहा यानि जहाँ चार रास्ते आपस में मिलते हैं. उस चौराहे पर एक विशाल वटवृक्ष हुआ करता था, लोग उसे थान के नाम से बुलाते थे. शायद उस वृक्ष ने नीचे किसी देवी देवता को स्थापित किया गया होगा. उस चौराहे से एक रास्ता उत्तर दिशा की तरफ जाता है जो आगे जाकर खेतों से लगता है. जहाँ किसान, मजदुर अपनी खेती-बारी के लिये जाया करते थे. दक्षिण दिशा आगे जाकर एक छोटे से बाजार में मिलता है जहाँ लोग अपने दैनिक जीवन से जुड़े सामान खरीदने - बेचने जाया करते थे. उत्तर पूर्व कोने में एक छोटा सा गाँव था. जब से वह वटवृक्ष सूख गया है, उस चौराहा पर जैसे उजाड़ सा हो गया. आने- जाने वाले पथिक जो वहां पहले थोडा रूककर सुस्ता लेते थे, अब सीधे चलते जाते हैं. छाँव की खोज में इधर -उधर देखते हुए. लोग आते हैं, लोग जाते हैं, चौराहा की वीरानी, उसकी ख़ामोशी किसी को न सुनाई देता है, न किसी को दिखाई देता है. पास ही एक मिडिल स्कूल है जिसमे वहां के बच्चे पढने जाते हैं. उसी में एक बच्चा है गणेश.


गणेश 10 साल का लड़का है. आज शाम जब वह अपने घर आया तो उसने अपने माँ से कहा – माँ! हमारे घर के सामने जो चौराहा है, वहां मुझे एक …