Mar 22, 2015

छोटी –छोटी बातों में ख़ुशी

ख़ुशी मन की एक अवस्था का नाम है. ख़ुशी, क्रोध, घृणा, ईर्ष्या, आदि मन के अनेक भाव होते हैं जो समय परिस्थिति, दशा, आदि अनेक बातों पर निर्भर करते हैं. ख़ुशी के बहुत सारे कारण हो सकते हैं. जब किसी को कामयाबी मिलती है, वह खुश हो जाता है. ज्यादातर लोग अपनी तारीफ सुनकर खुश हो जाते हैं. कुछ लोग नाच देखकर खुश होते हैं तो कुछ लोग अपना मनपसंद खाना खाकर खुश हो जाते हैं. आजकल के युवा विभिन्न पेय पदार्थ जैसे कोकाकोला, आदि पीकर खुश हो जाते हैं.  अर्थात खुश होने के हजारों वजह हो सकते हैं.

HAPPINESS

प्रस्तुत पोस्ट में मैं इस बात का जिक्र करना चाहती हूँ कि वो कौन सी छोटी छोटी बातें हैं जो मुझे ख़ुशी देती हैं. जब मेरे बनाये गए खाने की तारीफ होती है, मुझे बहुत ख़ुशी होती है. जब कोई मेरे घर आता है और मेरे घर की साफ़ सफाई की तारीफ करता है तो मुझे ख़ुशी होती है. जब मुझे कोई प्रेम पूर्वक कोई काम करने का आग्रह करता है, तो मुझे उस काम को करने में बहुत ख़ुशी मिलती है. मुझे पौधों की देख भाल कर बहुत ख़ुशी मिलती है.

कहा गया है कि दूसरों को मदद करने के बाद बहुत ख़ुशी मिलती है. यह सत्य है. हाल फिलहाल ही मैंने इस बात को महसूस किया है.

रात के कोई नौ बज रहे थे. मैं मार्किट में थी. रास्ते में मैंने एक बूढ़े –बूढी को खड़ा देखा. वह आते जाते लोगों से कुछ आग्रह कर रहे थे. जब मै भी उनके पास गयी तो उन्होंने मुझसे कहा – बेटी! मैं महाराष्ट्र का रहने वाला हूँ. मेरे पास पैसे नहीं हैं. मैं जिस ठेकेदार के पास काम करने आया, वह मुझे मिल ही नहीं रहा है. मेरे पास पैसे नहीं हैं. मुझे कुछ पैसे दे दो. बहुत भूख लगी है. पहले तो मैं सुनके थोडा आगे बढ़ गयी. लेकिन चलते चलते मैंने सोचा – कहीं सच में वे दोनों भूखे होंगे तो उनको कितना कष्ट होगा. मैं वापस आयी और अपने पर्स से २०० रूपये उनको दिए. वहां थोडा सा अँधेरा था. एक कार की लाइट में जब उन्होंने २०० रूपये देखे तो उनकी आँखों से आंसू छलक आये. उन्होंने बहुत ही आत्मयिता से मेरे सर पर हाथ रखते हुए मुझे आशीर्वाद दिया कि बेटी तुम सदा सुखी रहो. बात तो यह बहुत ही छोटी सी है, लेकिन जब कभी भी मुझे यह बात याद आती हैं, मेरा मन बहुत खुश हो जाता है. इसलिए यदि आप ख़ुशी चाहते हो तो यथासंभव  दूसरों की मदद करो. ख़ुशी या हैप्पीनेस खुद बखुद चलकर आपके पास आयेगी- ऐसा मैं मानती हूँ. लोगों को छोटी छोटी बातों में ख़ुशी ढूंढनी चाहिए. प्रकृति में ऐसी हजारों चीजें हैं जिनका सानिध्य हमारे अंतरतम को खुशियों से भर देता है. किसी बगिया में फूलों के मुस्कान को देखिये, किसी नदी टल पर जाल के प्रवाह को देखिये, गिलहरी को उछलते कूदते देखिये. हंसिये, हंसाइये और ख़ुशी पाइये.  

Mar 15, 2015

उनकी प्रेरणा मेरा संबल

आज मैं बहुत उदास हूँ. पता नहीं क्यों ऐसा लग रहा था कि कुछ न करूँ. चुपचाप बैठी रहूँ. बच्चों को स्कूल भेज दिया था. पति भी अपने ऑफिस के काम से बाहर गए हुए थे. मन बेचैन हो रहा था. कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा था. साँस की तकलीफ तो पहले से थी लेकिन उस दिन पता नहीं क्यूँ जैसे लग रहा था कि आज थोडा ज्यादा परेशान कर रहा है. अपने घर में अकेली चुपचाप बैठी थी. बड़े शहरों में सबसे बड़ा साथी टी वी होता है. टी वी ऑन किया. कभी सास बहू के सीरियल को ट्यून किया तो कभी कंप्यूटर चलाया. फेसबुक, ट्विटर सबको आजमा के देखा. लेकिन पता नहीं क्यों आज सब बेकार लग रहा था. मन में बहुत बुरे बुरे ख्याल आ रहे थे. मन आशंकित लग रहा था. पति भी बाहर ही थे. जीवन नीरस लग रहा था. इसी तरह के उलटे पुल्टे ख्याल मन में आये जा रहे थे. सोच रही थी क्या करूँ.


तभी मेरे दरवाजे पर लगी घंटी बजी. मैंने देखा कि दरवाजे पर मेरी सहेली मोना और गरिमा खड़ी हैं. मैंने जैस ही दरवाजा खोली, दोनों मुझसे लिपट गयी. What a pleasant surprise! मैंने कहा. मोना ने मुझे देखते ही कहा – क्या बात है तुम इतनी परेशान क्यों दिख रही हो? मैं झेप गयी और कहा – नहीं ऐसी कोई बात नहीं है. फिर गरिमा ने कहा – क्या यार! क्या बात करती हो! यह जरुर है कि हम बहुत दिनों बाद मिल रहे हैं, लेकिन मैं तुम्हारा शकल देख के बता सकती हूँ कि तुम अभी परेशान हो. उसने फिर कहा – देखो हम दोनों मिलके कैसे तुम्हरे मन की नेगेटिविटी को दूर करती हूँ. इसी बीच मैं उनके लिए चाय बनाने लगी तो दोनों भी किचन में आ धमकी और हमारे स्कूल और कॉलेज के दिनों का जिक्र करने लगी. जब उसने हमारे प्रेंक के बारे में बताना शुरू किया कि किस तरह से हम एक दूसरे के साथ प्रेंक किया करते थे. तो मेरी हंसी छुट गयी. कॉलेज में जब हम स्काउट के लिए गयी तो मेरी दोनों सहेली भी साथ थी. हमने खूब बातें की. खूब हँसे. मैंने मन ही मन सोचा – अभी कुछ देर पहले मेरे मन इतने बुरे -बुरे ख्याल आ रहे थे. जीवन नीरस और बेकार लग रहा था, लेकिन मेरी दोनों सहेलियों ने मेरे अन्दर , मेरे मन में नव उर्जा का संचार कर दिया. मेर अन्दर की सारी नेगेटिविटी को दूर कर दिया, हाँ, यह सच है जब हमारे मन में नकारात्मक विचार आते हैं तो हम बेकार की बातें सोचने लगते हैं. और जैसे की कोई पॉजिटिव थॉट वाला इन्सान हमारे सामने आता है वह हमें मोटीवेट कर देता है और हम फिर हम सकारात्मक बातें सोचने लगते हैं. मैं उस दिन मोना और गरिमा की उपस्थिति की वजह से बहुत हंसी बल्कि यूँ  कह सकती हूँ कि ज़ोर ज़ोर से खिलखिला कर हंसी. हँसना हीलर की तरह काम करता है. इसलिए जीना जरुरी है तो हंसना भी जरुरी है. हँसे और खूब हँसे. हंसने का कोई भी अवसर न गवाएं.

यादगार घर वापसी

इस पोस्ट में मैं एक ऐसी यादगार घटना का जिक्र करना चाहती हूँ जो मेरे 
लिए हमेशा एक यादगार पल रहेगा. बात उन दिनों की है जब मेरी छोटी बहन को बिटिया हुई थी. जब उसका जन्म  कुंडली बनाया गया तो पंडित ने एक विशेष पूजा करने को कहा. मेरी बहन अलीगढ के पास रहती है. इसलिए उस पूजा में हमें जाना बहुत जरुरी था. पति को ऑफिस में छुट्टी नहीं मिली. वह भी नहीं आ सकते थे. बच्चों का स्कूल था, उनके एग्जाम आनेवाले थे, इसलिए वे भी नहीं आये. मुझे ही अकेले जाना पड़ा. क्या करती मैं तीन दिन के लिए बहन के यहाँ अलीगढ चली गयी.
पति ने आश्वासन दिया – कोई बात नहीं. तुम जाओ. मैं यहाँ अपने घर में  सब सम्हाल लूँगा. जिसपर मुझे शंका थी. यह कैसे कर पायेंगे. क्या करती मैं चली गयी.
बहन के यहाँ बच्ची का नामकरण संस्कार हुआ. बहुत पूजा पाठ हुआ. गृह शांति के लिए पूजा-पाठ, हवन –यजन किया गया. मेरा तीन दिन तो बहन के पड़ोसियों के यहाँ जाने में, यहाँ वहां घुमने में ही बीत गया. जिस दिन मुझे वापस आना था उस दिन रविवार था. पति और बच्चे सभी घर पर ही थे. जब मैं गाड़ी से घर के पास उतरी तो अपने पति और बच्चे को वहां खड़ा पाया. वे मेरी प्रतीक्षा में खड़े थे. जब उनलोगों ने मुझे देखा उनके चेहरे पर ख़ुशी छा गयी. मेरे पति मंद-मंद मुस्कुरा रहे थे. बच्चे दौड़कर मेरे पास आये और मुझसे इस तरह से लिपट गए मानो मैं उनसे काफी दिनों से अलग थी.
अब हम सब साथ साथ अपने घर गए. घर के अन्दर जाते ही एक सुखद अहसास हुआ. यह मेरा अपना घर –जो मेरे लिए, मेरे पति के लिए और बच्चों के लिए बहुत खास है. जब मैं अपने घर में अपने बच्चों को हँसते-मुस्कुराते देखती और सुनती हूँ – तो मेरे अन्दर एक विशेष अनुभूति का संचार हो जाता है. कहा गया है एक हँसते मुसुराते परिवार के चारो तरफ का परिवेश भी हँसता रहता है. बच्चों की किलकारियों की आवाज जब आस पास के पेड़ पौधों तक पहुँचती है तो वे भी हँसते मुस्कुराते प्रतीत होते हैं. और जब घर में ऐसा वातावरण रहे तो चारों ओर  सकारात्मक उर्जा का संचार होता है. लोग सारे दुख दर्द भूलकर वर्तमान में खो जाते हैं. ऐसे में जी चाहता है कि समय की गति यही रुक जाये और यह सुखद अहसास सतत बना रहे. मैं तो मानती हूँ कि जिसे प्यार करने वाला पति और फूल जैसे प्यारे बच्चे मिल जाये उसका घर परिवार रूपी बगिया सदैव हरी-भरी रहती है.
जब मेरे बच्चों ने मुझे कई बार यह कहा कि मम्मा आप तीन दिन बाद आयी हो लेकिन लगता है कि आप कई साल के बाद आयी हो. हमने आपको बहुत मिस किया. मुझे अपने खास का अहसास हुआ. पति ने मुंह से कुछ  कहा नहीं लेकिन उनकी आखें भी कह रही थी कि उन्होंने भी मुझे बहुत मिस किया. वह क्षण मुझे आज भी जब याद आती है तो मेरा मन मुस्काने लगता है.

Mar 13, 2015

मेहनत और भाग्य से घर का सपना पूरा हुआ

जब भी मैं यह गाना सुनती कि एक बंगला बने न्यारा तो मन ही मन सोचती: ईश्वर
मेरे घर के सपना को कब पूरा करेंगे. किसी छोटे शहर में भी अपना एक घर होना बहुत बड़ी बात होती है. इसके लिए सबसे जरुरी है एकमुश्त बड़ी रकम, जो मेरे लिए बहुत मुश्किल था. घर का खर्च, बच्चों की पढाई बचत के नाम पर मात्र कुछ हजार होते थे. खैर, जब अन्य बहुत सारे लोगों को किराये के मकान में देखती तो मन को खुद ही संतोष दिलाती, ये लोग भी तो हैं, इनके पास भी तो अपना घर नहीं है. मेरे ही घर के सामने एक और परिवार रहता था. उस घर का आदमी फ़ोन पर ज़ोर से बातें करता था, यह बात ग्राउंड फ्लोर पर रह रहे मकान मालिक को पसंद नहीं आयी, घर खाली करने का फरमान दे दिया. कुछ मकान मालिक तो जूते-चप्पल गिना करते थे. मुझे भी कई बार मकान बदलना पड़ा.
एक दिन हमने मन में ठान लिया कि चाहे जो भी हो जाये अपना घर लेने की कोशिश करनी चाहिए. हमने घर के लिए एक बजट बनाया और घर सर्च करने लगी. कई घर देखे. कुछ तो पसंद नहीं आयी, कुछ के डॉक्यूमेंट पुरे नहीं थे. खैर जो होना होता है हो के ही रहता है. प्रथम प्रयास में एक घर पसंद आया लेकिन वह हमारे बजट में नहीं था. कोई तीन लाख ज्यादा का था.



मैंने अपने पति को एक आईडिया दिया. क्यों न हम इसका कोई प्लाट डाल दें. हमने अपनी बचत से दो प्लाट खरीद लिये. साथ ही साथ अपनी बचत को भी जारी रखा. कोई दो साल बाद हमें अपने प्लाट को सेल करने का ऑफर आया. वह भी बहुत अच्छे दाम पर. हमने अपना प्लाट बेचने से  पहले अपने लिए घर देखना शुरू किया. कोई एक महीने के बाद एक अपार्टमेंट में एक घर पसंद आया. लेकिन यहाँ भी कुछ रकम का अंतर था. लेकिन जब जो चीज आपके पास आनेवाला होता है तो आकर ही रहता है. उस घर के मालिक को भी पैसों की जरुरत थी. दरअसल वह अपना घर अपनी बेटी की शादी के लिए रकम जुटाने के लिए बेच रहे थे. उन्होंने मुझे एक ऑफर दिया कि जो थोड़ी सी रकम शेष रहती है वह आप मुझे दो महीने बाद दे देना. कोई प्रॉब्लम नहीं है. अंधे को क्या चाहिए – दोनों आँखें. हम खुश तो थे लेकिन दो महीने बाद भी वह रकम कहाँ से आयेगी. यह समस्या थी. शायद उपरवाला यह सब देख रहा था. हम जो प्लाट बेचना चाहता था, उसका अचानक रेट बढ़ गया और हमारा काम बन गया. उस सज्जन व्यक्ति ने अपने कहे अनुसार मकान की लिखा-पढ़ी कर दी और हम लोगों ने भी तय समय सीमा के अन्दर सारी रकम चुका  दी. आज हमलोग अपने घर में सानंद रह रहे हैं. ईश्वर की लाख कृपा है. मेहनत और भाग्य दोनों ने मिलकर हमारे घर के सपना को पूरा कर दिया.