दुलारपुर के आस-पास के धार्मिक और ऐतिहासिक स्थल

परमहंस घाट
वर्तमान के विसौआ घाट शिव मंदिर के निकट आंवला और कटहल के वृक्ष के नीचे बाया नदी के तट पर परमहंस नाम के एक संन्यासी का आगमन हुआ. वे एक सिद्ध पुरुष थे. कहा जाता है कि उन्होंने ध्यानावस्था में ही इसी स्थान पर समाधि ली थी. अभी भी लोग उनकी समाधि पर पुष्प और गंगा जल चढाते हैं. इस घाट का पुनरुद्धार बाबा रामदास ने १९५४ ईस्वी में यहाँ प्रथम श्री विष्णु यज्ञ कराकर किया था. उसके बाद इसी स्थल पर उन्हीं के द्वारा तीन अन्य यज्ञ भी कराये गए थे.

बाबा कृष्णाराम का थान
सरकारी घाट विसौआ के निकट एक विशाल पीपल का वृक्ष था जो बाबा कृष्णाराम थान के नाम से जाना जाता है. उसी के बगल में रामपुर गोपी मौजे में मुस्लमानों का एक कब्रिस्तान भी है.

लक्ष्मण गिरि थान
वर्तमान तीनमुहानी से लगभग २०० गज दक्षिण की दुरी पर एक समाधि स्थल है जहाँ कि कई पिंड नुमा देवता हैं. अभी भी लोग उनपर फूल और गंगा जल चढ़ाते हैं. कहा जाता है कि इसी स्थल पर लक्ष्मण गिरि नाम के एक संन्यासी ध्यानमग्न होकर समाधिस्थ हो गए थे. इस स्थान से कुछ ही दुरी पर रातगाँव महंथ घाट है जो कि महंथ गिरि नाम के संन्यासी का समाधि स्थल है.

मुग़लकालीन बाँध
मुग़लकाल में वर्तमान बाया नदी का निर्माण एक नहर के रूप में किया गया था. नहर की मिट्टी को बाया नदी के पूर्वी ओर जमा कर दिया गया था जो कि एक छोटा -सा बाँध बन गया था. १९४८ के पहले उस मुग़लकालीन बाँध का अवशेष मिलता था परन्तु लघु सिंचाई विभाग द्वारा १९४८ -४९ में बाढ़ से बचाव के लिए उस बाँध पर मिट्टी देने का काम प्रारंभ किया गया जिसे हसनपुर के कुछ प्रभावशाली लोगों ने रुकवा दिया क्योंकि उन लोगों की काफी जमीन नदी के तटीय क्षेत्र में था जिसमे मिट्टी काटने से उन लोगों को भारी नुकसान पहुचता. बाद में जब १९६७ - ६८ के वर्षों में जब संयुक्त मोर्चे की सरकार बनी तो तत्कालीन सिंचाई मंत्री श्री चन्द्रशेखर सिंह के द्वारा श्रम दान अभियान चलाकर और क्षेत्र के लोगों से सहयोग लेकर बाँध पर मिट्टी दिया गया. एक प्रत्यक्षदर्शी के मुताबिक चन्द्रशेखर सिंह कुदाल से मिट्टी काटकर टोकरी भरते थे और बाबा रामदास अपने माथे पर टोकरी उठाकर बाँध पर मिट्टी डालते थे. इस प्रकार मुग़ल कालीन बाँध का जीर्णोद्धार हुआ.

अजगर वटवृक्ष
यह इस क्षेत्र का एक प्रसिद्द लैंडमार्क है. तत्कालीन दरभंगा महाराज के विशाल मौजे बिनलपुर में गुप्ता बाँध के किनारे बाया नदी से सटे जिसे अभी ताजपुर घाट के नाम से जाना जाता -एक विशाल वट वृक्ष था. जिसका अवशेष अभी भी वर्तमान है. कुछ लोगों का कहना है कि इस पर एक विशाल अजगर सांप रहता था. लोग गलती से भी इधर से नहीं गुजरते थे. यह इस क्षेत्र का एक चर्चित जगह है

 

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