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Showing posts from April, 2013

Some More Family Tree of Adharpur, Teghra, Begusarai

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बहुआयामी प्रतिभा के धनी श्री सच्चिदानंद पाठक

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श्री सच्चिदानंद पाठक किसी परिचय के मोहताज नहीं है। आप एक अच्छे शिक्षक, कवि , मंच संचालक, लेखक और लोक गायक हैं। आपकी लेखनी खासकर लोक गीतों में समाज की कुरीतियों पर करारा  प्रहार होता है। पाठक जी को विद्वता विरासत में मिली है। इनके पिता स्व मंगल पाठक ग्राम रघुनन्दन पुर संस्कृत के उच्च कोटि के विद्वान थे। श्री सच्चिदानंद पाठक एक कुशल भजन गायक हैं । इनके भजन कर्णप्रिय होते हैं। आप हिंदी, संस्कृत, मैथिली और अंग्रेजी के अच्छे ज्ञाता हैं। इनके कई कैसेट भिन्न भिन्न कंपनी से निकल चुके हैं। इनके कुछ गीत बुढ़ारी में घिडारी, धैलोउन पेटकुनिया काफी लोकप्रिय हुए हैं।

अधारपुर की कहानी

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अधारपुर बेगुसराय जिला के तेघरा प्रखंड में राष्ट्रीय राजमार्ग 28 पर अवस्थित गाँव है. दुलारपुर और अधारपुर पहले संयुक्त था लेकिन अब जनसँख्या बढ़ने के कारण यह ताजपुर अधारपुर पंचायत के नाम से जाना जाता है.
बैजनाथ सहाय ( कायस्थ ) अधारपुर मौजे के मालिक हुआ करते थे. किसी कारणवश बैजनाथ सहाय का अधारपुर मौजे नीलम हो गया. नीलामी के बाद अधारपुर मौजे अयोध्या अंग्रेज कोठी के तत्कालीन कोठीवाल के अधीन चला गया. बाद में दुलारपुर मठ के महंथ ने अंग्रेजो से अयोध्या कोठी को खरीद लिया. उसके बाद गंगा कटाव से उत्पन्न पुनर्वास की समस्या आने पर हरिअम्मेय और ढेऊरानी को दुलारपुर मठ के इसी जमीन यानि अधारपुर मौजे में बसाया गया. इनका वास यहाँ १८७९-८७ में गंगा कटाव के उपरांत यहाँ आ गया. इसके पहले इन लोगों का वास महराजी दियारा में था.
हरिअम्मेय रखवारी गाँव अभी भी तिरहुत में विद्यमान है. वहीँ से दो सगे भाई नीम और दामोदर दुलारपुर दियारा आये. उनकी शादी ढेऊरानी के पोती से साथ हुआ. कालांतर में जन नीम और दामोदर दोनों भाई जन अपने गाँव हरिअम्मेय रखवारी गए तो वहां के लोगों ने उन्हें ये कहते हुए फटकारा कि तुमलोग जाती भ्रष्ट हो ग…

दुलारपुर के आस-पास के धार्मिक और ऐतिहासिक स्थल

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परमहंस घाट वर्तमान के विसौआ घाट शिव मंदिर के निकट आंवला और कटहल के वृक्ष के नीचे बाया नदी के तट पर परमहंस नाम के एक संन्यासी का आगमन हुआ. वे एक सिद्ध पुरुष थे. कहा जाता है कि उन्होंने ध्यानावस्था में ही इसी स्थान पर समाधि ली थी. अभी भी लोग उनकी समाधि पर पुष्प और गंगा जल चढाते हैं. इस घाट का पुनरुद्धार बाबा रामदास ने १९५४ ईस्वी में यहाँ प्रथम श्री विष्णु यज्ञ कराकर किया था. उसके बाद इसी स्थल पर उन्हीं के द्वारा तीन अन्य यज्ञ भी कराये गए थे.
बाबा कृष्णाराम का थान सरकारी घाट विसौआ के निकट एक विशाल पीपल का वृक्ष था जो बाबा कृष्णाराम थान के नाम से जाना जाता है. उसी के बगल में रामपुर गोपी मौजे में मुस्लमानों का एक कब्रिस्तान भी है.
लक्ष्मण गिरि थान वर्तमान तीनमुहानी से लगभग २०० गज दक्षिण की दुरी पर एक समाधि स्थल है जहाँ कि कई पिंड नुमा देवता हैं. अभी भी लोग उनपर फूल और गंगा जल चढ़ाते हैं. कहा जाता है कि इसी स्थल पर लक्ष्मण गिरि नाम के एक संन्यासी ध्यानमग्न होकर समाधिस्थ हो गए थे. इस स्थान से कुछ ही दुरी पर रातगाँव महंथ घाट है जो कि महंथ गिरि नाम के संन्यासी का समाधि स्थल है.
मुग़लकालीन बाँध मु…

चकवार का इतिहास

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चकवार से संबंधित अनुसन्धान करते समय पटना विश्वविद्यालय  के प्रोफेसर के. के. दत्ता द्वारा लिखित पुस्तक पढने का मौका मिला. प्रोफेसर के. के. दत्ता पटना विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग के एक प्रख्यात इतिहासकार थे. उनके पुस्तक के कुछ पेज यहाँ दिए जा रहे हैं.



















चकवार के इतिहास से संबंधित दस्तावेज

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दुलारपुर में ज्यादातर लोग भरद्वाज गोत्र के हैं जिनके पूर्वज चिरायु और चिन्मय मिश्र बैलौचे सुदे डीह से यहाँ बेगुसराय  जिले के चाक और दुलारपुर आये थे. उसी से संबंधित कुछ दस्तावेज यहाँ दिए जा रहे हैं.