Dularpur Darshan -17


नहीं रहे 'भैय्या एक्सप्रेस' के सर्जक अरुण प्रकाश




नई दिल्ली: हिन्दी के वरिष्ठ साहित्यकार, पत्रकार और ख्यातिनाम लेखक अरुण प्रकाश का लम्बी बीमारी के बाद आज नई दिल्ली में निधन हो गया। वह  ६४ वर्ष के थे। प्रबंध विज्ञान के अंगरेजी माध्यम के छात्र होते हुए भी अरुण प्रकाश ने हिन्दी लेखन को अपनी आजीविका के साथ-साथ अपने हुनर को अभिव्यक्त करने का माध्यम बनाया और उसमें वे बखूबी सफल रहे।




अंगरेजी से हिन्दी में उम्दा अनुवाद के लिए भी उन्हें बार -बार सराहा गया । राष्ट्रीय सहारा अखबार से कमलेश्वर जी के अनुरोध पर पत्रकारिता की यात्रा शुरू करने वाले अरुण प्रकाश उन चुंनिंदा लोगों में शुमार हैं, जिन्होंने हिन्दी की सेवा के लिए सरकारी नौकरी ठुकरा दी और संघर्ष की राह चुनी।

अरुण प्रकाश का जन्म १९४८ में बिहार के बेगूसराय में हुआ़ था। उन्होंने स्नातक प्रबंध विज्ञान और पत्रकारिता में स्नातकोत्तर डिप्लोमा की शिक्षा हासिल की थी. पर किताबी ज्ञान से इतर अपने आस पास के लोगों और सामाजिक चहल-पहल और गतिविधियों पर पैनी नजर ने उनके लेखन को एक अलग तेवर और धार दी । अपने लेखकीय जीवन में यों तो उन्होंने ढेरों रचनाएँ लिखीं पर उनमें से प्रमुख थीं,  कहानी संग्रह भैया एक्सप्रेस,, जलप्रांतर, मंझधार किनारे, लाखों के बोल सहे और विषम राग । उन्होंने कई उपन्यास भी लिखे थे, जिनमें कोंपल कथा प्रमुख है। उन्हें कविता लिखने का भी शौक था।

कविता संकलन 'रात के बारे' में काफी चर्चित रहा। उन्होंने अंग्रेजी से हिन्दी में विभिन्न विषयों की आठ पुस्तकों का अनुवाद भी किया था। अपने जीवन काल में वह अखबारों व पत्रिकाओं का संपादन, कई धारावाहिकों, वृत्तचित्रों तथा टेलीफिल्मों के पटकथा लेखन और प्रोडक्शन से सम्बद्ध रहे, उन्होंने कई अखबारों के लिए स्तम्भ भी लिखे। 

प्राय: एक दशक से कथा समीक्षा और आलोचना लेखन के अलावा उन्हें अनेक राष्ट्रीय स्तर की संगोष्ठियों में सहभागिता का अनुभव रहा। उन्हें साहित्यकार सम्मान, हिन्दी अकादमी;  दिल्ली कृति पुरस्कार, हिन्दी अकादमी;  दिल्ली रेणु पुरस्कार, बिहार शासन के दिनकर सम्मान से भी सम्मानित किया गया, साथ ही साथ उन्हें सुभाष चन्द्र बोस कथा तथा कृष्ण प्रताप स्मृति कथा पुरस्कार से भी नवाजा गया था।

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