Jun 28, 2012

दुलारपुर दर्शन-23

दुलारपुर का चित्रनारायण महाल 



दुलारपुर गाँव की एक बेटी नरहन स्टेट में ब्याही गयी। कहा जाता हे कि बेटी के पिता ने दुलारपुर गाँव अपनी बेटी को दान स्वरूप उसके खोइछे में दिया था। परन्तु खेतों में कृषि कार्य पिता ही करते आ रहे थे। जब नरहन स्टेट वालों ने अपनी जमीन दखल करना चाहा तो दुलारपुर के लोगों को ऐतराज हुआ और नरहन के लोगों को खेत पर से भगा दिया गया।


परन्तु कागजी मामलें मं नरहन के लोग ही सही थे। उन लोगों ने कानूनी प्रक्रिया शुरू की, तथ्य नरहन के कुछ लोगों ने प्रशासन के कहने पर दुलारपुर जाकर अपनी जमीन दखल करनी चाही। वे करीब सौ लोग नरहन से आकर वर्तमान बाया नदी के इस पार दी अपना छावनी लगाया। वे लोग अगले सुबह में खेत पर छावा बोलने जाते। राहगीरों के द्वारा दियारा में बसे दुलारपुर के लोगों को इन सारी बातों की जानकारी मिली। अतः गाँव के एक तेज एवं साहसी आदमी को वहाँ वहाँ उनके पास भेजा। वह आदमी घोड़े पर चढ़कर छावनी के बगल से ही गुजरा। वहाँ छावनी के लोगों ने उसे बुलाया और पुछा क्या तुम दुलारपुर गाँव से आ रहे हो? उसने कहा - क्या यह बताओगे कि दुलारवासी हम लोगों के आने की खबर जानते हैं। उसने कहा - हाँ जानते हैं तभी तो वहाँ हजारों पहलवान को जुटा देखा। पॅडारक, सिमारिया, मोकामा कई जगह के पहनवान को बुलाया गया है, वे लोग की सवेरे किसी खेत पर जानेवाले हैं, वहीं पर नरहन से लड़ाई होने वाली है।


ऐसा उसने बिल्कुल झूठ बोला था, दरअसल दुलारपुर के तरफ से किसी भी पहलवान को नहीं बुलाया गया था। यह अब सुनने के बाद एक ने कहाμकहाँ हम सौ और वह हजार। अतः हमला करना ठीक नहीं होगा। हम लोग वापस ही लौट चलें। ऐसा ही हुआ। वे सवेरे वापस नरहन लौट गये। उन्होंने गाँव के प्र. विशिष्ट व्यक्ति पर मुकदमा दायर कर दिया। केस चल पड़ा। अब नरहन के लोगों को दुलारपुर का ही एक गवाह तलाशना था ताकि वे केस जीत सकें। उन्होंने गाँव के एक सीध-साध आदमी को चुना, जो हरिनारायण सिंह का पोता था, परपोता रहा होगा। उसने उन्हें प्रलोभित करते हुए कहा - अगर आप सही-सही बयान देंगे, तो अंग्रेज आपको चौधरी  की उपाधि देंगे । आपका नाम चारों तरफ फैल जायेगा।


वे बेचारे सीधा -साधा  आदमी था ही कोर्ट में बयान दे दिया कि साहेब चन्दन लगाता हूँ, पेजा-पाठ, गाँगा-स्नान करता हूँ। झूठ नहीं कहूँगा। वास्तव में यह जमीन इन्हीं लोगों का ही है। दुलारपुर के लोगों ने यह जमीन इन्हें दान में दे दी है तथ्य इनके खेत पर जाने पर कुछ लोगों ने नरहन वासियों को खदेड़ दिया था। सभी नब्बे लोगों को तीन-तीन महीने की सजा हुई तथ्य उस गवाह को अंग्रेजों ने चैध्री कहकर पुकारना प्रारंभ कर दिया। चैध्री उपराम प्राप्ति की एक किंवदन्ती यह भी है। जो आजतक वर्तमान है। बाद में जब जमीन का स्थायी बन्दोबस्त हुआ तथ्य सर्वे हुआ तब दुलारपुर नाम के साथ चित्रानारायण जुट गया। कहा जाता है कि बाबू चित्रानारायण सिंह तत्कालीन कामेश्वरनारायण सिंह के खानदान के सम्बन्ध् ी थे। एक बार 1948 में श्री कामेश्वरनारायण सिंह कार्तिक मास में गँगा सेवन करने अपने मुलाजिमों के साथ दुलारपुर दियारा आये। उन्होंने अपना शिविर बाबा जगन्नाथ दास ठाकुरवारी  के निकट लगाया। उनके गँगा सेवन के पश्चात, उक्त वैवाहिक संबंध् को यादगार बनाने हेतु उन्होंने दुलारपुरवासियों को एक शाम (रंगूनिया चावल) भोज खिलाया था और श्री रामनरेश सिंह उसके प्रत्यक्षदर्शी थे। उनके अनुसार - श्री कामेश्वर नारायण सिंह ने अपना कुर्ता  तक गंजी तो खोल ही लिया था तथा  भोज खाने वाले सभी लोगों को भी अपना कुर्ता  खोल लेने के लिए कहा था। अतः लोगों से अपना कुरता  आदि खोलकर काँख तले दबा लिया था। तत्पश्चात् भोज खोते थे। श्री कामेश्वर नारायण सिंह स्वयं भोज का मुआयना करते थे तथा आपसी संबंध् की चर्चा करते थे।

Jun 21, 2012

Dularpur Darshan - 22


Seven wonders of Patna

Patnaites have traditionally had an emotional sense of belonging. By participating overwhelmingly in the Seven Wonders of Patna, you have confirmed our conviction that landmarks in a city are more than just cultural or historical artefacts, that they anchor us to our Universe, help us build a sense of community and a unique identity.

Over the past few days we presented to you 14 fascinating stories about well-known and not-so-well-known landmarks in the city. They included monuments, bridges, places of worship and even a Biological Park. The response was fantastic, reaffirming our belief that the majority of Patnaites are committed stakeholders in our city. Eventually, the Seven Wonders of Patna were decided through your SMS and website votes, and we are happy to present the final list to you.
  • Golghar
    Golghar, a single dome structure built in the native Stupa architecture, is a unique architectural wonder. This massive and bulbous beehive of a granary was built in 1786 by Captain John Garstin, in the hope of avoiding a repeat of the vicious 1770 famine. Overlooking the Ganges, its dual spiralling staircases give an unparalleled view of the city and the river.
  • Mahatma Gandhi Setu
    Built over the river Ganges, connecting Patna in the south to Hajipur in the north of Bihar, Mahatma Gandhi Setu has a length is 5,575 metres (18,291 ft)which makes it was one of the longest bridges in the world. It was inaugurated in May 1982 by the then Prime Minister, Mrs Indira Gandhi. Cantilever segmental construction method was adopted to construct this architecturally magnificent bridge.
  • Gandhi Maidan
    Centrally located in the city of Patna and spread across an area of 62 acres, Gandhi Maidan is a historic and iconic ground. It saw the launch of several movements during the Indian freedom struggle, including the Champaran movement and the Quit India movement of 1942. Many prominent leaders of the Indian Independence Movement, such as Mahatma Gandhi, Rajendra Prasad, Anugrah Narayan Sinha, Sardar Patel, Maulana Azad, Nehru, Jaya Prakash Narayan and Sri Krishna Sinha addressed their rallies from here. Lined beautifully with trees all across and encircled by busy roads, this iconic ground is home to various fairs and exhibitions besides being the venue for Republic Day and Independence Day ceremonies.
  • Khuda Bakhsh Library
    Close to the banks of the Ganges, in Patna, stands the Khuda Bakhsh Oriental Public Library- one of the oldest libraries in India. It is a unique repository of about 21000 Oriental manuscripts and 2.5 lakh printed books. It was opened for public in October, 1891 by the illustrious son of Bihar Khan Bahadur Khuda Bakhsh with 4,000 manuscripts, of which he inherited 1,400 from his father Maulvi Mohammed Bakhsh. It is known for its rare collection of Persian and Arabic manuscripts. It also hosts paintings made during the Rajput and Mughal eras of India and even the Quran inscribed in a book just 25mm wide.
  • Patna Women’s College
    Founded in 1940 by Bishop B.J. Sullivan S.J. and Mother M. Josephine, the building for Patna Women’s College was so carefully designed in 1948, so as to match in beauty the High Court opposite which it was situated. Called an ‘Architect’s dream’, the college building is a unique synthesis of Hindu, Islamic, Norman and Gothic styles. The magnificence and heritage value of this institution is unmatched.
  • Patna Sahib Gurdwara
    A magnificent holy shrine, Takht Sri Harimandir Ji, Patna Sahib is situated in one of the old quarters of Patna city. This is the place where the tenth sikh Guru, Guru Gobind Singh Ji was born in 1666. Situated at the bank of the Ganges, the magnificent gurdwara houses relics of the Guru Gobind Singh Ji, including a 'pangura' (cradle) with four stands covered with golden plates, four iron arrows, sacred sword of the Master and a pair of his sandals. The architecturally rich shrine has an interesting history. When the ancient Harmandir was burnt down by fire, Maharaja Ranjit Singh had re-built it in white marble in 1839. When this was destroyed by the earthquake of 1934, the present Harmandir was built in 1954.
  • Patna College
    Patna College situated on the bank of the river Ganga, is the 2nd oldest Educational Institution in the entire Eastern region of India. This premier college was founded on 9th January, 1863. The administrative block of the college is the oldest of all the buildings. It used to be the site for an opium store-house and a Dutch factory in the 17th century, much before the college was started. Other buildings were constructed gradually over a period of time. The college building, having the status of a heritage site by the Archaeological Survey of India, is an architectural marvel.

Jun 19, 2012

Dularpur Darshan -21

Arun Praksh ( अरुण प्रकाश )




जन्म : 22फरवरी 1948 में बेगूसराय (बिहार) जिला के निपनियां गाँव में।
शिक्षा : स्नातप्रबंध विज्ञान और पत्रकारिता में स्नातकोत्तर डिप्लोमा।
प्रकाशित कृतियाँ : कहानी-संग्रह : भैया एक्सप्रेस,जलप्रांतरमँझधारकिनारेउस रात का दुःख, लाखों के बोल सहे,विषम राग आदि...
आलोचना : गद्य की पहचान 
उपन्यास : कोंपल कथा
कविता-संकलन : रक्त के बारे में
अनुवाद : अंग्रेजी से हिंदी में विभिन्न विषयों की आठ पुस्तकों के अनुवाद।
अनुभव : अखबारों व पत्रिकाओं कासंपादन। खासकरसाहित्य अकादमी की पत्रिका'समकालीन भारतीय साहित्य' का कई  वर्षों तक संपादन।कई  धारावाहिकों,वृत्त चित्रों तथा टेली-फिल्मों के लिए लेखन से संबद्ध रहे, कई स्तंभों के लिए भीलेखन। प्राय: एक दशक  से कथा-समीक्षा और कथेतर-गद्यों की आलोचना में सक्रीय थे। अनेक  राष्ट्रीय स्तर की संगोष्ठियों में सहभागिता।
सम्मान : साहित्यकार सम्मानहिंदी अकादमीदिल्ली, कृति पुरस्कार, हिंदी अकादमीदिल्लीरेणु पुरस्कारबिहार शासनदिनकर सम्मानसुभाष चन्द्र बोस था-सम्मान, कृष्ण प्रताप स्मृति कथा पुरस्कार सहित कई सम्मानों से सम्मानित।
निधन : 18 जून 2012 को नई दिल्ली के पटेल चेस्ट अस्पताल में दिन के लगभग एक बजे उनहोंने अंतिम सांस ली
उनका अंतिम-संस्कार उसी दिन शाम साढ़े छः बजे लोदी रोड में हुआ




Dularpur Darshan -20


एक कहानी नहीं पूरा शोध प्रबंध है 'भैया एक्सप्रेस'



अरुण प्रकाश चले गए यूं लगा मानो भैया एक्सप्रैस पंजाब पहुंचने से पहले ही अकस्मात दुघर्टनाग्रस्त हो गया हो। उस पर सवार रामदेव अब कैसे अपने भैया विशुनदेव को खोज कर लाएगा। नवब्याही भौजी कब तक इंतजार करती रहेगी। माई कब तक कनसार में अनाज भूनकर, सत्तू पिसकर पंडितजी से लिए कर्ज का सूद भरती रहेगी।
कम से कम मुझे तो यह आशा जरूर थी की अरुण प्रकाश अपने जीवन में ही पुरबियों जिसमें बिहार पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार,  झारखंड आदि के गरीब मजदूरों के साथ अन्य राज्यों में पंजाब, हरियाणा, महाराष्ट्र और उत्तर पूर्वी राज्यों में अन्याय बंद हो जाएगा। पर नहीं आज भी लाखों मजदूर अन्य प्रदेशों में रोजी-रोजगार के लिए जानवरों की भांति अनेक भैया एक्सप्रैस रेलगाड़ियों में ठुंसे चले जा रहे हैं। अमानवीय स्थितियों में काम करने को मजबूर हैं। उनका शोषण घर में निकलने के साथ जो शुरु होता है वह रेल के जनरल डब्बों में टिटियों, भेंडरों, हिजडों, कुलियों, पॉकेटमारों से लेकर जिस-जिस व्यक्तियों से साबका पड़ता है सब लूटता है। सामान्य शहरी बाबूओं को तो उनको देखते ही उबकाई आती है। जहां जाते हैं वहां की सरकारों के लिए तो बोझ हैं ही,   
अरुण प्रकाश ने ऐसे दारूण समय में भैया एक्सप्रैस कहानी लिखकर लोगों का ध्यान खींचा जब बिहारी मजदूरों को पंजाब में भीड़ से, रेल गाड़ियों से, बसों से अलग कर करके मूली, गाजर और कद्दु की तरह काटा जा रहा था। इनके लिए सरकार या समाज कहीं से कोई सहानुभूति के कोई शब्द नहीं, कोई मुआवजा नहीं, इनका कोई मानवाधिकार नहीं। मानो वे इसी तरह के नृशंस हत्याओं और अमानवीय व्यवस्था में जीने के लिए पैदा हुए हों। इनकी माएं रेडियो में कान गडाए इंतजार करतीं और सुनती प्रतिदिन हत्याओं की काफी कमकर बताए कुछ संख्या, पत्नी और बच्चे गांव के बनिए से कर्ज लेकर कमाने गए के सूद भरते और इंतजार करते-करते रोज मरती खपती। कभी किसी का छोटा भाई तो किसी का बूढ़ा बाप अपनों को ढूंढने भैया एक्सप्रैस पे सवार हो बचते-बचाते उन्हें ढूंढने जाता और पाता सिर्फ दुःख। दारूण दुःख जिसका कोई पारावार नहीं।
इसी को शब्द दिया अरुण प्रकाश ने भैया एक्सप्रैस लिखकर। यह सिर्फ एक कहानी नहीं पूरा समाजशास्त्र, शोध प्रबंध है पूर्वांचल हिन्दी प्रदेश के मजदूरों का। दिल्ली के दंगो में सिखों की निर्मम हत्याएं हुई। अनेक दंगो में मुसलमानों की हत्याएं हुई। दोषियों पर मुकदमे चले, इनके परिवारों को मुआवजे मिले, इनके साथ इंसाफ के लिए मानवाधिकार संगठन अनेकों स्वैच्छिक संगठन संघर्ष किए और कर रहे हैं। पर इन बेचारे मजदूरों को अब तक क्या मिला अभी तक ठीक-ठीक कोई अध्ययन तक नहीं हुआ है कि कितने मजदूर पंजाब में उस दौरान मारे गए इंसाफ, मुआवजे, मुकदमों आदि की क्या कहने कोई सहानुभूति के शब्द तक नहीं अगर कभी अध्ययन हुए और आंकड़े बाहर आए तो चौंकाने वाले आंकड़े होंगे। अगर इन शहीद पूर्वी प्रदेश के मजदूरों को कोई सच्ची श्रद्धांजलि मिली तो कथाकार अरुण प्रकाश की तरफ से यह कहानी जिसका नाम है- भैया एक्सप्रैस।
मैं अपने संकोची स्वभाव के कारण कई बार उनको कई कार्यक्रमों में सुनता उनसे आमन-सामना भी होता पर अपनी दिल की बात नहीं कर पाता एक बार करीब चार-पांच साल पहले साहित्य अकादमी में लाइब्रेरी के बाहर बने सीढ़ीनुमा बैठकी पर मोबाइल से किसी से बात में तल्लीन थे मैं उनके करीब गया और नमस्ते किया उन्होंने अपने पास बगल में बिठा लिया और अपनी कहानियों के बारे में खुलकर बातें की। मैं जब उनसे उपरोक्त लिखी कई बातों का कहानी के संदर्भ में उल्लेख किया तो वे मुझे निहारने लगे और बोले भाई मैं तो जब भैया एक्सप्रैस लिखा तो इतना सोचा भी नहीं था तो मैंने कहा आपने यह कहानी लिखकर जिस समस्या की ओर इंगित किया वह आज भी दिल्ली समेत पंजाब हरियाणा महाराष्ट्र, पूर्वोत्तर के कई प्रदेशों में जारी है। फिर मेरे बारे में पूछा तो मैंने बताया मैं उस समय में एक सामाजिक संगठन में रिसर्चर था उसके बारे में बताया और कहानी लिखने की रूचि के बारे में भी। उन्होंने सिर्फ यही कहा कि देखिए हिन्दी में कहानी लिखकर तो परिवार तो चला नहीं पायेंगे इसलिए इसे तो अतिरिक्त भाव शौकिया ही करना पड़ेगा इसलिए जो भी लिखिए ठोस लिखिए और छपास बीमारी से ग्रसित होकर किसी के आगे-पीछे चक्कर लगाकर बेकार में ऊर्जा नष्ट मत कीजिए......। मुझे उनसे एकबार मिलकर और कई मुद्दों पर बातें करनी थी पर भैया एक्सप्रैस बीच में ही दुर्घटनाग्रस्त हो गई, उनकी कही बातें आज भी मुझे शब्दशः याद हैं।

Dularpur Darshan-19


अरुण प्रकाश के अप्रकाशित उपन्यास का अंश


अरुण प्रकाश ने मिथिला-कोकिल विद्यापति के जीवन को आधार बनाकर एक उपन्यास लिखा था. जिन दिनों मैं ‘बहुवचन’ का संपादन कर रहा था उसका एक अंश भी ‘बहुवचन’ के ११ वें अंक में प्रकाशित किया था. लेकिन पता नहीं क्यों उन्होंने इस उपन्यास को प्रकाशित नहीं करवाया. असल में, अरुण प्रकाश जी परफेक्शनिस्ट थे. जब तक अपनी किसी रचना से पूरी तरह संतुष्ट नहीं हो जाते थे उसे प्रकाशित नहीं करवाते थे. ‘पूर्वराग’ नामक उस उपन्यास की एक हलकी-सी झांकी लेते हैं।



पूर्व राग

श्रृंगार में पूर्व राग होता है. विद्यापति न केवल पूर्व राग के कवि थे बल्कि वे पूर्वी प्रदेशों के राग भी थे. असमिया, ओडिया, बांग्ला और नेपाली भाषाओं में विद्यापति के पद हैं तो कई भाषाओं में उनका प्रभाव लक्षित होता है. धार्मिक मार-काट के उस दौर में वैष्णव संप्रदाय ने पूर्वी भारत की लहुलूहान आत्मा पर कोमल फाहा रखा था और उसके रस थे विद्यापति.
इस उपन्यास में विद्यापति के सारे अंतरंगों के भाष्य हैं. इस प्रस्तुति में मिथिला के पक्षधर जयदेव का भाष्य है, जो आपबीती के साथ जगबीती भी सुनाते हैं.

पक्षधर भाष्य

मेरी ख्याति इस रूप में रही कि मैंने जिस भी पक्ष से शास्त्रार्थ किया वही पक्ष जीता. इसीलिए मेरा नाम जयदेव मिश्र से बदल कर लोगों ने पक्षधर मिश्र कर दिया. जिस काल में मेरा जन्म हुआ मिथिला में वह काल दर्शन के उत्कर्ष का काल था. वेद और उपनिषद दर्शन के मूल थे. लेकिन उपनिषद और ब्राह्मण ग्रंथों का प्रभाव अधिक था. क्योंकि औपनिषदिक काल के दो प्रमुख दार्शनिक जनक और याज्ञवल्क्य मिथिला के ही थे. 

मैं सरीसव गाँव में प्रसिद्ध पंडित महामहोपाध्याय भवनाथ मिश्र के टोल में पढ़ा करता था. भवनाथ मिश्र मेरे नाना पंडित हरि मिश्र के के काका थे. उनके टोल की ख्याति दूर-दूर प्रागज्योतिषपुर(गुवाहाटी), जगन्नाथ पुरी, नेपाल, नवद्वीप, नेपाल, त्रिपुरा राज तक फैली थी. महामहोपाध्याय की विद्वत्ता चारों ओर फैली थी. वे कृशकाय थे, गौरवर्ण, लंबा, सीकिया शरीर. लेकिन जीवन के चौथे में होने के बावजूद उनके दांत वज्र की तरह कठोर थे. आँखों में कोई धुंधलापन नहीं आया था. छोटे-छोटे अक्षरों की पोथी स्वयं पढ़ लेते थे. वैसे उन्हें पढ़ने की जरुरत ही क्या थी. अधिकांश पोथियाँ तो उन्हें कंठस्थ थीं. उन्होंने वर्षों से अन्न त्याग रखा था. फल, दूध, दही, उबली सब्जियां ग्रहण करते थे. सवेरे उठकर स्नान-ध्यान करते. जलपान के बाद टोल का एक चक्कर लगाते यह देखने के लिए कि शिक्षक छात्र को पढ़ा रहे हैं या नहीं. शिक्षकों से दो-चार बातें कर फिर स्वाध्याय में जुट जाते. हम छात्रों को अकेले उनके पास जाने की मनाही थी. जब किसी शंका का निवारण हमारे शिक्षक नहीं कर पाते तभी शिक्षक हमें महामहोपाध्याय के पास ले जाते. वे विकट तर्कशास्त्री, कर्मकांड में निष्णात, अर्थशास्त्री(तब राजनीति शास्त्र, प्रशासन, संधि-विग्रह, राजनय आदि का सम्मिलित नाम यही था) थे.

उनके पास राजपुरुष, राज-अधिकारी, विद्वतजन, संत-महात्मा आते रहते. उनसे परामर्श कर लौट जाते. हम टकटकी लगाये दूर से सब देखा करते थे. लेकिन उनके पास जाने का साहस नहीं जुटा पाते थे.

महामहोपाध्याय की ख्याति सिर्फ मिथिला तक नहीं थी बल्कि बंगाल, असम, उड़ीसा और उत्तर भारत के अन्य सत्ता केन्द्रोंमें भी थी. कहते हैं जब महामहोपाध्याय युवा थे तब राजाओं के आमंत्रण पर कर्मकांड संपन्न करवाने जाया करते थे. 

महामहोपाध्याय को संपत्ति, सत्ता या सत्ता से निकटता का लोभ कभी नहीं रहा. मिथिला की आत्मा के वे प्रहरी थे. मिथिला के शासक ओइनवार वंश वंश में कोई ऐसा नहीं था जो कठिन प्रश्नों और समस्याओं पर उनसे सलाह ना ले. उस वंश में किसी में यह साहस नहीं था कि महामहोपाध्याय के नैतिक और सुचिंतित सलाह की अवहेलना कर दे. उनके एक आह्वान पर मिथिला का जनमत डोलने लगता था. वे राजपंडितों के पंडित थे. वे सुखी दिखते थे. लेकिन अन्न त्याग देने से लगता था कि वे मन ही मन कोई प्रायश्चित कर रहे हों. 

मेरे नाना हरि मिश्र बार-बार कहते- ‘हरि तत्वचिंतामणि लिखकर पूज्य गंगेश उपाध्याय ने न्याय दर्शन की जो धारा बहाई उसका विकास मिथिला में नहीं हो रहा है. छत्तीस नदियों से मथी जाने वाली मिथिला बाढ़, अकाल, गरीबी, जड़ शासन और अवरुद्ध समाज के लिए नहीं जाना जाता है. ज्ञान की दीप्ति ही मिथिला का मुकुट है. यदि वह ज्ञान छिन गया तो मिथिला गौरव विहीन हो जायेगी. दरिद्रों से जब आत्मगौरव छीन जाता है तो दरिद्रता स्थायी हो जाती है. मनुष्य नदी और समुद्र में तैरने के बजाय कुएं का बेंग होकर रह जाता है. सर्वदा स्मरण रखना कि समाज और देश को विचार ही संकट से उबारता है. हरि, इन्हीं छात्रों को न्याय के अध्ययन के लिए प्रेरित करते रहो. कोई कोंपल तो फूटेगा जो विशाल वृक्ष बन जाएगा.’ 

टोल में व्याकरण, साहित्य, ज्योतिष, कर्मकांड, आयुर्वेद, षड्दर्शन, न्याय दर्शन, अर्थशास्त्र और कलाओं के अध्ययन की व्यवस्था थी. मेरी रूचि आयुर्वेद की तरफ थी लेकिन मेरे नाना ने साम-दाम दंड-भेद का उपयोग कर न्याय दर्शन की तरफ मोड़ दिया था. धीरे-धीरे मैंने तर्क को ही ज्ञान का मार्ग मान लिया था. 

मेरे ठीक उलट था विद्यापति ठाकुर. सांवला, दुबला-पतला लेकिन मजबूत. उसके स्वभाव की कोमलता का पता पहले ही दिन चल गया था. जब अपने पिता राज पंडित गणपति ठाकुर के बगल में वह महामहोपाध्याय के साथ खड़ा रो रहा था. टोल में आने वाले नए छात्र अक्सर अपने अभिभावक से बिछुड़ने के दुःख में उदास हो उठते थे. पर वह तो रो ही पड़ा था. जैसे टोल शिक्षा संस्थान न होकर कोई वध स्थल हो. 

विद्यापति को मेरे नाना के समूह में ही रखा गया था. फिर उससे मेरी निकटता बढ़ी तब उसने बताया, ‘मेरे साथ ही ऐसा क्यों होता है? प्राणों से भी प्यारा रहा है मेरा गाँव विस्फी. अचानक वहां से हटाकर मुझे राजधानी ओईनी भेज दिया गया. फिर माँ से अलग कर यहां सरिसव गाँव में पटक दिया गया. गाँव के मेरे मित्र सखा, ओईनी के मेरे मित्र राजकुमार शिव सिंह इन्द्रसेन, गदाधर, सुभद्र सब छूट गए. मित्रों परिजनों को छोड़ ज्ञान के लिए भटकना क्या उचित है? जो ज्ञान दुःख दे उससे क्या लाभ?’ 

मैं तत्क्षण समझ गया था कि विद्यापति में ज्ञान का मोह नहीं है. जीवन का मोह है. ज्ञान का राग नहीं है, जीवन का राग है. फिर भी मैंने स्वभाव से बाध्य होकर विद्यापति को कोंचा. उसकी सुलभ कोमलता का उपहास उड़ाया. विद्यापति और डर गया. तब मैंने वरिष्ठ छात्र होने के नाते विद्यापति को उपदेश दे डाला- ‘तुम यहां टोल में हो. छात्रों के रहने के लिए चटिसार(छात्रावास) है. यहां रुखा-सूखा भोजन मिलेगा. तापस जैसा कठोर जीवन जीना पड़ेगा. लेकिन स्मरण रखना कि तुम किसी पत्रहीन नग्न गाछ के नीचे खड़े वर्षा और धूप नहीं झेल रहे हो. साधारण वस्त्र पहनने होंगे. चटिसार के भोजन से तुम्हारी जिह्वा तृप्त नहीं होगी. लेकिन ज्ञान की तृप्ति अवश्य मिलेगी. सभी शास्त्रों के एक से एक शिक्षक यहां हैं. तुम मिथिला के सर्वश्रेष्ठ टोल में आए हो. विभिन्न क्षेत्रों का परिचय बढ़ेगा. मित्रता स्थापित होगी. इसलिए विद्यापति यह विलाप छोड़ो और प्रवृत्त हो जाओ. सर्वदा स्मरण रखना कि पाठ स्मरण न करने पर तुम्हें भारी दंड दिया जाएगा. शिक्षक यह नहीं सोचेंगे कि तुम राजपंडित गणपति ठाकुर के पुत्र हो. और महामहोपाध्याय तो गणपति ठाकुर के गुरुवत हैं. तुम शिक्षा समाप्त किए बिना टोल से छुटकारा नहीं पा सकोगे.’

विद्यापति मेरी एक-एक बात गुनता रहा. आगे चलकर उसके स्वभाव में परिवर्तन आया. वह संतुलित हो चुका था. थोड़ी परिपक्वता आ गई थी. फिर भी मैं उसे यदा-कदा छेड़ता, ‘खेलन! ओईनी जाने का मं नहीं करता. महामहोपाध्याय से कहकर तुम्हें विस्फी भिजवा दूँ?’ विद्यापति ने एक बार चिढकर कह ही दिया, ‘महामहोपाध्याय तुम्हारे परनाना हैं. लेकिन उनके समक्ष तुम्हारे नाना पंडित हरि मिश्र भी बोल नहीं पाते. तुम क्या बोल पाओगे? जयदेव तर्क करते-करते दूसरों में दोष देखना तुम्हारा स्वभाव बना गया है. तुम अच्छे तार्किक हो. मौलिक तर्क उपस्थित करते हो लेकिन अब तुम्हें दूसरों को नीचा दिखाने में आनंद आने लगा है. ज्ञान के साथ अगर विनम्रता नहीं है तो उस ज्ञान की सुगंध फैलती नहीं है. तुम दूसरों में सिर्फ दोष देखने के बजाय गुण भी देखने का अभ्यास करो. नकार से जीवन बंध जाता है, सकार से जीवन सधता है. वही उसका पाथेय भी होता है.’

मैं जीवन के अंतिम चरण में सोचता हूं कि तब विद्यापति ने ठीक ही कहा था. हालांकि विद्यापति से मेरा मतभेद दृष्टिकोण को लेकर सर्वदा रहा. वह जीवन के हर क्षेत्र में सकारात्मक समन्वय का पक्ष लेता रहा और मैं दर्शन के क्षेत्र में अकाट्य तर्कों के बल पर ज्ञान-दिग्विजय का स्वप्न देखा करता था. और अपने इस स्वप्न का पीछा करते-करते किसी भी लक्ष्मण रेखा को पार करने को तत्पर रहता था. वहीं विद्यापति ने अनगिनत अवसरों और प्रलोभनों के बावजूद अपनी लक्ष्मण रेखा का उल्लंघन कभी नहीं किया. वह जीवन प्रवाह में सहज रूप से बहता जाता था. जब जो घात आया वहीं रम जाता था. और फिर अगर धारा में बहने की नौबत आई तो तो उस घाट का मोह छोड़कर धारा में यों बहने लगता जैसे वह पुराने घाट पर गया ही नहीं. विद्यापति का जीवन उसके गाँव की कमला नदी जैसा था. सावन-भादो आते ही कमला जैसे अपने किनारों को लाँघ जाना. वही कमला शांत सकुचाती वर्ष के बाकी महीनों में बहती रहती है तब भी किसी को अचरज कहां होता. क्योंकि यह सब कुछ धर्म के अनुकूल है. साभार - जानकी पुल 

Dularpur Darshan-18


‘पैन इंडियन राइटर’ थे अरुण प्रकाश




परंपरा और आधुनिकता के संगम के अपूर्व शिल्‍पी, संवेदना से लबरेज और भारतीय समाज की गहरी जातीय चेतना के विशिष्‍ट चितेरे अरुण प्रकाश का हमारे बीच से यूं चले जाना हिंदी साहित्‍य के लिए प्रचलित अर्थों में रस्‍मी किस्‍म की अपूरणीय क्षति नहीं है, बल्कि सही मायनों में देखा जाए तो ऐसी क्षति है, जिसकी भरपाई मौजूदा हालात में दूर-दूर तक दिखाई नहीं देती। मैंने उन्‍हें एक सिद्धहस्‍त कथाकार ही नहीं वरन ऐसे कई रूपों में देखा-जाना है, जिन्‍हें समझे बिना असली अरुण प्रकाश को नहीं जाना जा सकता। अरुणजी हिंदी की लुप्‍त होती मसिजीवी परंपरा के विरल लेखकों में थे, जिन्‍होंने पूरा जीवन ही लेखनी के बल पर जीया। और वैसा जीवन बहुत कम लेखकों ने जीया होगा, जिसमें कभी किसी के पास न तो वे काम मांगने गये और ना ही अपनी विपन्‍नता का कभी रोना रोया। स्‍वाभिमानी लेखन की ऐसी मिसाल दुर्लभ ही मिलती है। उनकी जिंदादिली और उन्‍मुक्‍तता ऐसी थी कि कोई उस नारियल जैसे रूखे-सूखे खांटी व्‍यक्तित्‍व के भीतर छिपे कोमल श्‍वेत संसार में यदा-कदा ही दाखिल हुआ होगा और उनकी अपनी संघर्ष गाथा से परिचित हुआ होगा। उनकी यह जिंदादिली अंतिम समय तक बरकरार रही।

उनके व्‍यक्तित्‍व की विराटता से नामवर सिंह जैसे आलोचक भी चकित रहे हैं और उन पर गहरा भरोसा जताते रहे हैं। अरुण जी का जितना कम जीवन रहा, उतने में उनकी इतनी सारी उपलब्धियों को देखें तो अनुमान लगाना मुश्किल होता है कि क्‍या इतनी कम उम्र में कोई व्‍यक्ति इतना सारा काम कर सकता है। उनकी आयु के समकालीन लेखकों से उनकी कोई तुलना ही नहीं की जा सकती। वे कविताएं लिखते थे, उन्‍हीं के शब्‍दों में जब सुधर गये तो कहानी में आए। और हम जानते हैं कि भैया एक्‍सप्रेस’, जल प्रांतर और गजपुराण जैसी विलक्षण कहानियों से उन्‍होंने हिंदी कहानी में एक समय में ऐसी धूम मचाई थी कि हर कोई उनकी कहानियों का दीवाना था। वे सच में एक अलग ही किस्‍म के किस्‍सागो रहे। उनकी किस्‍सागोई में हमारी पुरानी आख्‍यान परंपरा का जादू था तो आधुनिक चेतना और मानवीय संवेदना का विरल विलयन भी। समाज पर उनकी इतनी गहरी पकड़ थी कि उन्‍होंने यशवंत व्‍यास के संपादन दैनिक नवज्‍योति समाचार पत्र में मध्‍यवर्गीय जीवन की विडंबनाओं पर बहुत रोचक कहानियां लिखीं, जिन्‍हें अपार प्रशंसा भी मिली। वे हिंदी के उन गिने-चुने लेखकों में हैं, जिन्‍हें पैन इंडियन राइटर कहा जा सकता है। उनके जितना विशद अध्‍ययनी लेखक दूसरा देखने में नहीं आता।  

उन्‍होंने जब आलोचना शुरु की तो आलोचना में भी ऐसी धाक जमाई कि कई बड़े आलोचक भी उनके प्रशंसक हो गये। आलोचना की विखंडनवादी परंपरा को हिंदी में इतने निर्मम तरीके से लागू किया कि पाठ की धज्जियां बिखेर दी। मैत्रेयी पुष्‍पा के उपन्‍यासों का जो विश्‍लेषण अरुण जी ने किया, वह हिंदी में दुर्लभ है। पिछले कई वर्षों से वे हिंदी में अपनी ही तरह का अलग काम साहित्‍य विधाओं पर कर रहे थे। प्रगतिशील वसुधा में प्रकाशित उनके लेखों को हिंदी के विद्यार्थी खोज-खोज कर पढ़ते थे। इसी वर्ष विश्‍व पुस्‍तक मेले में अंतिका प्रकाशन ने उनके इस महत्‍वपूर्ण कार्य को एक पुस्‍तक के रूप में प्रकाशित किया है गद्य की पहचान। शंभुनाथ जैसे आलोचक ने इसे हिंदी की पहली किताब कहा है जो इस तरह गद्य की विधाओं पर इतने विस्‍तार में बताती है। यह कम आश्‍चर्य की बात नहीं है क्‍या कि आधुनिक हिंदी साहित्‍य के विकास के इतने वर्षों में विधाओं पर कोई किताब ही नहीं थी।

अरुण प्रकाश ने अपने छोटे-से जीवन में इतनी बड़ी चिंता वाला काम अंजाम दिया कि और कुछ नहीं तो कुछ कहानियां और यह अकेला काम ही उनको सदियों तक याद रखने के लिए काफी होगा। उन्‍होंने जीवन में एकमात्र सरकारी नौकरी साहित्‍य अकादमी में की, जहां वे समकालीन भारतीय साहित्‍य के संपादक रहे। उनके संपादन में इस पत्रिका ने न केवल अपने पिछले कई अंकों का बैकलॉग पूरा किया,बल्कि नियमित भी निकलने लगी। अरुण जी ने मेरे जैसे उनके अनेक मित्रों को इस पत्रिका में शायद ही कभी प्रकाशित किया हो। उनके संपादन में मैंने बस एक किताब की समीक्षा लिखी थी। वे अक्‍सर कहते थे कि सरकारी पत्रिका में यह ध्‍यान रखना होता है कि उसकी प्रकृति के अनुसार सब तरह के लोगों को स्‍थान दिया जाए और मैत्रीधर्म को अलग रखा जाए, वरना तो लोग तुरंत आरोप लगा देंगे कि देखिये यह क्‍या हो रहा है। वे स्‍नेह से मुझे अपनी टीम-ए का सदस्‍य मानते थे और कहते थे कि जब टीम बी ही अच्‍छा खेल रही है तो टीम  को खिलाने की कहां जरूरत है। कहना न होगा कि उनके संपादन काल में इस पत्रिका पर किसी किस्‍म की गुटबाजी का आरोप शायद ही लगा हो। जहां तक मैं समझता हूं, उनके दौर में इस पत्रिका में सभी भाषाओं के कई नए रचनाकार प्रकाशित हुए। उनके दौर में साहित्‍य अकादमी लेखकों की राजनीति के कारण चाहे जितनी विवादास्‍पद रही हो, पत्रिका किसी विवाद में नहीं आई।  

बहुत कम लोग जानते हैं कि उनके पिता बिहार के बड़े नेताओं में से थे और सांसद थे। लेकिन अरुण जी ने कभी पिता की हैसियत का कोई लाभ नहीं लिया, अलबत्‍ता उस पहचान को अपने व्‍यक्तित्‍व से अलग ही रखा। पिता की जब हत्‍या हुई अरुण जी की उम्र बहुत अधिक नहीं थी। उन्‍होंने अपने अकेले दम पर जिंदगी की राह खुद बनाई और एक बड़ा मुकाम हासिल किया। छात्र जीवन से ही जुझारू अरुण जी की सीपीआई के जनांदोलनों में सक्रिय भागीदारी रही और कई मामलों में उन पर केस भी दर्ज हुए थे। उन्‍होंने ही एक बार मुझे बताया था कि जब कॉमरेड इंद्रजीत गुप्‍त गृहमंत्री थे तो उन्‍होंने ही छात्र जीवन के उन पुराने मामलों को बंद करवाया था।

आम तौर पर अरुण जी को लोग साहित्‍यकार के रूप में ही अधिक जानते हैं। लेकिन उनके कई दूसरे परिचय भी हैं, जो उनकी बहुविध प्रतिभा को दर्शाते हैं। जैसे वे आरंभ में अमिताभ बच्‍चन की तरह किसी बड़ी कंपनी के मार्केटिंग ऑफिसर रहे और नौकरी छोड़ दी। हिंदी और अंग्रेजी के कई अखबारों में उन्‍होंने आर्थिक विषयों पर नियमित लेख लिखे। समाजशास्‍त्र, अर्थशास्‍त्र और कई विषयों की अनेक किताबों का अनुवाद किया। ना जाने कितनी विदेशी फिल्‍मों के संवादों के हिंदी में अनुवाद किये, जिनसे हिंदी में डब फिल्‍में प्रदर्शित हुईं। डिस्‍कवरी चैनल की हिंदी में शुरुआत हुई तो अरुण जी ने ही उस काम को संभाला। सिनेमा और टेलीविजन के बहुत से कार्यक्रमों में वे परदे के पीछे से लेखन कार्य में सहयोग करते रहे। मोबाइल क्रांति के आरंभिक दौर में हैंडसेट में हिंदी प्रयोग की शुरुआत उनके ही निर्देशन में हुई। पेंग्विन जैसे प्रकाशन हिंदी में आए तो आरंभिक दौर में अरुण जी उनके मुख्‍य सलाहकार जैसी भूमिकाओं में रहे। अपनी भाषा और उसके लेखकों के प्रति उनका अनुराग ही उन्‍हें इतने विभिन्‍न क्षेत्रों में ले गया। वे अक्‍सर कहते भी थे कि अपनी भाषा का ऋण चुका रहा हूं।

वे निरंतर काम करते रहते थे, बीमारी के दौर में भी कुछ न कुछ पढते रहना या लिखना उनकी दिनचर्या में रहा। उन्‍होंने कभी अपनी रचनाओं के प्रकाशन के बारे में अधिक नहीं सोचा, वरना उनके पुस्‍तक रूप में अप्रकाशित कामों की ही संख्‍या इतनी है कि कम से कम बीस किताबें तैयार हो सकती हैं। मैं जब पिछले साल 2011 में उनसे मिलने गया था तो वे कह रहे थे कि एक बार तबियत ठीक हो जाए तो कहानी, आलोचना और निबंधों की दस किताबें तैयार करनी हैं और साहित्‍य विधाओं वाला काम पूरा करना है। लेकिन स्‍वास्‍थ्‍य ने उनका साथ नहीं दिया। 22 फरवरी, 1948 को जन्‍मे अरुण प्रकाश यूं 64 बरस की छोटी-सी उम्र में हमें छोड़कर चले जाएंगे, इसकी तो कल्‍पना भी नहीं की थी। साभार - जानकी पुल 

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नहीं रहे 'भैय्या एक्सप्रेस' के सर्जक अरुण प्रकाश




नई दिल्ली: हिन्दी के वरिष्ठ साहित्यकार, पत्रकार और ख्यातिनाम लेखक अरुण प्रकाश का लम्बी बीमारी के बाद आज नई दिल्ली में निधन हो गया। वह  ६४ वर्ष के थे। प्रबंध विज्ञान के अंगरेजी माध्यम के छात्र होते हुए भी अरुण प्रकाश ने हिन्दी लेखन को अपनी आजीविका के साथ-साथ अपने हुनर को अभिव्यक्त करने का माध्यम बनाया और उसमें वे बखूबी सफल रहे।




अंगरेजी से हिन्दी में उम्दा अनुवाद के लिए भी उन्हें बार -बार सराहा गया । राष्ट्रीय सहारा अखबार से कमलेश्वर जी के अनुरोध पर पत्रकारिता की यात्रा शुरू करने वाले अरुण प्रकाश उन चुंनिंदा लोगों में शुमार हैं, जिन्होंने हिन्दी की सेवा के लिए सरकारी नौकरी ठुकरा दी और संघर्ष की राह चुनी।

अरुण प्रकाश का जन्म १९४८ में बिहार के बेगूसराय में हुआ़ था। उन्होंने स्नातक प्रबंध विज्ञान और पत्रकारिता में स्नातकोत्तर डिप्लोमा की शिक्षा हासिल की थी. पर किताबी ज्ञान से इतर अपने आस पास के लोगों और सामाजिक चहल-पहल और गतिविधियों पर पैनी नजर ने उनके लेखन को एक अलग तेवर और धार दी । अपने लेखकीय जीवन में यों तो उन्होंने ढेरों रचनाएँ लिखीं पर उनमें से प्रमुख थीं,  कहानी संग्रह भैया एक्सप्रेस,, जलप्रांतर, मंझधार किनारे, लाखों के बोल सहे और विषम राग । उन्होंने कई उपन्यास भी लिखे थे, जिनमें कोंपल कथा प्रमुख है। उन्हें कविता लिखने का भी शौक था।

कविता संकलन 'रात के बारे' में काफी चर्चित रहा। उन्होंने अंग्रेजी से हिन्दी में विभिन्न विषयों की आठ पुस्तकों का अनुवाद भी किया था। अपने जीवन काल में वह अखबारों व पत्रिकाओं का संपादन, कई धारावाहिकों, वृत्तचित्रों तथा टेलीफिल्मों के पटकथा लेखन और प्रोडक्शन से सम्बद्ध रहे, उन्होंने कई अखबारों के लिए स्तम्भ भी लिखे। 

प्राय: एक दशक से कथा समीक्षा और आलोचना लेखन के अलावा उन्हें अनेक राष्ट्रीय स्तर की संगोष्ठियों में सहभागिता का अनुभव रहा। उन्हें साहित्यकार सम्मान, हिन्दी अकादमी;  दिल्ली कृति पुरस्कार, हिन्दी अकादमी;  दिल्ली रेणु पुरस्कार, बिहार शासन के दिनकर सम्मान से भी सम्मानित किया गया, साथ ही साथ उन्हें सुभाष चन्द्र बोस कथा तथा कृष्ण प्रताप स्मृति कथा पुरस्कार से भी नवाजा गया था।

Dularpur Darshan-16


कथाकार अरुण प्रकाश का लंबी बीमारी के बाद निधन


नई दिल्ली।।18 June 2012 हिन्दी के जाने-माने कथाकार अरुण प्रकाश का सोमवार को लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया। वह करीब 64 वर्ष के थे।

बेगुसराय का एक रत्न अरुण प्रकाश अब हमारे बीच नहीं रहे 


सूत्रों ने बताया कि प्रकाश का सोमवार को दोपहर करीब एक बजे दिल्ली के पटेल चेस्ट अस्पताल में निधन हो गया। वह यहां काफी लंबे समय से सांस की बीमारी का इलाज करा रहे थे। अरुण प्रकाश का जन्म 18 जुलाई 1948 को बेगूसराय (बिहार) के निपनिया  गांव में हुआ था। उनके परिवार में पत्नी, एक बेटी और एक बेटा है। प्रकाश को बतौर कथाकार 'भइया एक्सप्रेस' से पहचान मिली। उनकी प्रमुख रचनाओं में 'मझधार किनारे', 'जलप्रांतर', 'विषमराग' और 'लाखों के बोल सहे' (कहानी संग्रह), 'कोपल कथा' (उपन्यास), 'रात के बारे में' (काव्य संग्रह) और 'हिन्दी के प्रहरी रामविलास शर्मा' (आलोचना) शामिल हैं।

अरुण प्रकाश ने दूरदर्शन की बहुचर्चित टीवी सांस्कृतिक पत्रिका 'परख' के करीब 450 एपिसोड लिखे थे और वह साहित्य अकादमी की साहित्यिक पत्रिका 'समकालीन भारतीय साहित्य' के संपादक रहे। उन्हें कई साहित्यिक पुरस्कारों से भी सम्मानित किया गया था। भगवन उनकी आत्मा को शांति दें ।

Jun 15, 2012

दुलारपुर दर्शन-14

                                                        Change in Bihar



                Source: Outlook
 




Jun 13, 2012

दुलारपुर दर्शन-13


संसद से सड़क तक संघर्ष का ऐलान


वाम एकता को मजबूत किया जाएगा और सूबे के सुलगते सवालों को लेकर जबरदस्त आंदोलन छेड़ा जाएगा। संसद से लेकर सड़क तक पर भाकपा संघर्ष करेगी। उक्त बातें भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) के नव निर्वाचित राज्य सचिव कामरेड राजेंद्र प्रसाद सिंह ने रविवार की दोपहर स्थानीय कार्यानंद भवन में आयोजित संवाददाता सम्मेलन को संबोधित करते हुए कही। राज्य सचिव ने कहा कि आने वाले दिनों में पार्टी भूमिसंघर्ष को तेज करेगी। बिजली, पानी के मुद्दे को लेकर भी सड़क पर उतरेगी। उन्होंने संवाददाता सम्मेलन में वाम-जनवादी एकता पर बल दिया। वहीं, एक सवाल के जवाब में कहा कि निकट भविष्य में लालू-रामविलास के साथ चुनावी गठजोड़ की कोई उम्मीद नहीं है। संवाददाता सम्मेलन में मौजूद पूर्व सांसद व वरीय नेता शत्रुघ्न प्रसाद सिंह ने भी कुछ ऐसे ही संकेत दिए।
इधर, संवादाताओं को संबोधित करते हुए राज्य सचिव राजेंद्र प्रसाद सिंह ने कहा कि पंचायतों में व्याप्त भ्रष्टाचार को लेकर भी पार्टी संगठित आंदोलन चलाएगी। पार्टी गांवों की ओर रूख करेगी। उन्होंने नारा दिया- पार्टी बढ़ाओ, पार्टी को फैलाओ। हालांकि, उन्होंने पार्टी की शक्ति में आई कमी को भी रेखांकित किया, परंतु यह भी कहा कि स्थिति वाम के पक्ष में है। जरूरत है मजबूती से संघर्ष चलाने की। बोले, वाम दलों द्वारा संयुक्त रूप से 15 जून को समाहरणालय पर विभिन्न मुद्दों व मांगों को लेकर धरना दिया जाएगा।
दुलारपुर निवासी कामरेड राजेंद्र प्रसाद सिंह बीच  में माला  पहने हुए    

राज्य सचिव ने बीते दिनों आयोजित पार्टी के राष्ट्रीय महाधिवेशन व बिहार राज्य सम्मेलन की भी जानकारी दी। कहा- महाधिवेशन में 76 लाख रुपए खर्च आए जो जनसहयोग से प्राप्त हुआ।
बोले, राज्य सम्मेलन में 415 प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया। जिसमें 65 महिला थी। बहस में 67 प्रतिनिधि शामिल हुए। मौके पर पूर्व सांसद शत्रुघ्न प्रसाद सिंह, पार्टी नेता गणेश सिंह, अशोक सिंह, एटक के चन्देश्वरी प्रसाद सिंह आदि उपस्थित थे।
साभार : दैनिक  जागरण