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Showing posts from January, 2012

दुलारपुर दर्शन - 5

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दुलारपुर मठ (DULARPUR MATH) दुलारपुर का अपना गौरवशाली इतिहास रहा है। वस्तुतः दुलारपुर के इतनी प्रसिद्धि  में दुलारपुर मठ की अहं भूमिका रही है। जहाँ एक ओर दुलारपुर मठ अध्यात्म, धर्म  और ज्योतिष विद्या का प्रमुख केन्द्र एवं प्रचार स्थल रहा है वहीं दूसरी ओर धर्मंनिरपेक्ष भावनाओं का भी प्रवाहस्थल रहा  है। अतीत से वर्तमान तक दुलारपुर मठ दान स्थल और सामाजिक न्याय का केन्द्र बिन्दु रहा है। दुलारपुर मठ के चारों तरफ मठ की ही देखरेख में, संरक्षण में विभिन्न छोटी-छोटी जातियों का भरण पोषण होते आया है। सबों में आपसी सौहाद्र एवं एका की भावना दुलारपुर मठ की सबसे बड़ी उपलब्धि है। अतः दुलारपुर मठ का इतिहास जाने वगैर दुलारपुर ग्राम का इतिहास अधुरा  साबित होगा।

दुलारपुर मठ संन्यासियों का प्रमुख धर्मं स्थल रहा है। यहाँ के महंथ का उपनाम भारती हैं। देवी के ब्रह्माण्ड से पूरी, ललाट से भारती, जिह्वा से सरस्वती, वाहु से गिरि, पर्वत, सागर एवं कुक्षि से बन एवं अरण्यं उपनाम वाले संन्यासियों की उत्पत्ति मानी जाती है। भारती दक्षिण के अवस्थित श्रृंगेरीमठ के संन्यासी, पुरी, भारती और सरस्वती उपनामवाले संन्यासी का सबसे …

दुलारपुर दर्शन -4

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गंगा का कटाव और दुलारपुर
दुलारपुर के विकास की कहानी 

जैसा कि आपने पिछले पोस्ट में पढ़ा कि दुलार राय के मरणोपरान्त चिन्मय मिश्र को उनकी सारी जमीन-जायदाद मिली। दुलार राय की स्मृति में ही दुलारपुर नाम रक्खा गया। ज्ञातव्य है कि दुलार राय काफी  धनी-मानी व्यक्ति थे। प्रत्येक समृध  एवं सम्पन्न लोगों के बड़े कारोबार को देखने चलाने के लिये कारिन्दे या मैनेजर होते हैं। दुलार राय के यहाँ भी ढेऊरानी रहता था। सीमान पर देखभाल के लिये उनको पश्चिम से जमीन दिया गया। वही उनके  कारबार की देख रेख करता था। सभी लोग ढेऊरानी को ही दुलार राय का उत्तराधिकारी मानते थे। परन्तु दुलार राय ने अपनी सारी सम्पत्ति पं. चिन्मय मिश्र के नाम पर कर दी। ढेऊरानी दवंग एवं नामी पहलवान था। दुलार राय की मृत्यु के बाद ढेऊरानी ने मिश्र जी से अपना हिस्सा मांगा। मिश्र जी सीधे -साधे  व्यक्ति थे। अतः उन्होंने आधा  हिस्सा ढेऊरानी को दे दिया। ढेऊरानी को दो पुत्र हुए। एक को कई पुत्र थे परंतु दूसरे को सिर्फ  एक पुत्री थी। ढेऊरानी की जायदाद का आधा -आधा  हिस्सा दोनों पुत्रों  को मिला। कालान्तर में ढेऊरानी के पोते की सारी जमीन या तो बिक गयी …

दुलारपुर दर्शन - 3

नामकरण चौहद्दी एवं विस्तार प्रलय में बचे मनु शतरूपा से या महाभारत के युद्ध  में कौरव और पाण्डव की सेना के बचे लोगों से, या फिर  डार्विन के विकासवादी सिधांत  के अनुसार एक कोशीय प्राणी से बहुकोशीय प्राणी फिर  बंदर... मनुष्य.  किस प्रकार मनुष्य की उत्पत्ति हुई ? इस विवाद में हमें नहीं पड़ना है। वर्तमान में भी भूत के अवशेष पुरातत्वविद् प्राप्त कर रहे हैं, विकास की तरह-तरह की क्रमिक पद्धतियों  का ज्ञान हो रहा है।
कहा जाता है- शायद तेरहवीं शताब्दी का पूर्व पाद था।  भाग्य लक्ष्मी हिन्दूओं से रूठकर यवनों के गले में जयमाला पहना चुकी थी। अर्थात  हिन्दुओं के अंतिम सम्राट पृथ्वीराज पर मुहम्मद गोरी विजय पा चुका था। गौरवमयी दिल्ली का पुण्य-स्थल यवनों का क्रीडा  स्थल बन चुका था। उस समय दिल्ली के राज सिंहासन पर मुहम्मद गोरी का एक दास कुतबद्दीन ऐवक विराजमान था। उसी समय, पण्डारक से लेकर वर्तमान के राष्ट्रीय राजपथ-28 के करीब तक , सेउनार मंदिर से लेकर रूपसबाज, मउ बाजार (फलाशीशी कोठी )के बीच लगभग 32000 बीघा जमीन के मालिक
दुलारचन्द राय हुआ करते थे। वे इस  क्षेत्र के जमीदार ही नहीं प्रधान  भी थे। अतः उनका प्…

दुलारपुर दर्शन -2

दुलारपुर  गाँव  का भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन में बहुत ही महत्वपूर्ण  योगदान रहा है । रघुनाथ ब्रह्मचारी , गंगा  बाबु आदि लोगों ने भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन में सक्रिय रूप से भाग लिया था । भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद आजादी से पहले जब दुलारपुर आये थे तब दुलारपुर मठ के महंथ श्री प्रभु चरण भारती ने उन्हें १००० रूपये चंदा दिया था । दुलारपुर मठ का अपना गौरवशाली इतिहास रहा है।  यह आध्यात्मिक और सांकृतिक हलचल का एक महत्वपूर्ण  केंद्र रहा है ।