Showing posts from 2012

दुलारपुर दर्शन - 31

 मेरी दादी का निधन
आज दिनांक  02-11-2012 ( शुक्रवार )  सुबह 4.18 मिनट पर  मेरी दादी का निधन  हो गया. मेरी दादी का नाम बच्ची  देवी है। मेरे दादाजी श्री सूबे लाल सिंह जो कि एक अमीन  थे, का देहांत लगभग दो साल पहले हो गया था । मेरी दादी ग्राम सिमरिया की रहनेवाली थी . उनके पिताजी बाबु अधिकलाल  सिंह थे .

दुलारपुर दर्शन -32

ग्रामीण क्लब दुलारपुर ने महंथ हरिहर चरण भारतीवॉली बॉल शील्ड  प्रतियोगिता  वर्ष 2012 का  आयोजन  किया . यह प्रति वर्ष छठ पूजा के अबसर पर आयोजित किया जाता है . उससे जुडी कुछ तस्वीरें :

Meet Nick Vujicic

Nicholas James Vujicic (born 4 December 1982) is a Serbian Australianevangelist and motivational speaker born with tetra-amelia syndrome, a rare disorder characterised by the absence of all four limbs. As a child, he struggled mentally and emotionally as well as physically, but eventually came to terms with his disability and, at the age of seventeen, started his own non-profit organisation, Life Without Limbs. Vujicic presents motivational speeches worldwide, on life with a disability, hope and finding meaning in life. He also speaks about his belief that God can use any willing heart to do his work and that God is big enough to overcome any and all disabilities.

Dularpur Darshan - 30

Ten Simple Rules to build up your self-confidence:

1. Formulate and stamp indelibly on your mind a mental picture of yourself as succeeding. Hold this picture tenaciously. Never permit it to fade. Your mind will seek to develop this picture. Never think of yourself as failing; never doubt the reality of the mental image. That is most dangerous, for the mind always tries to complete what it pictures. So always picture "success" no matter how badly things seem to be going at the moment. 2. Whenever a negative thought concerning your personal powers comes to mind, deliberately voice a positive thought to cancel it out. 3. Do not build up obstacles in your imagination. Depreciate every so-called obstacle. Minimize them. Difficulties must be studied and efficiently dealt with to be, eliminated, but they must be seen for only what they’ are. They must not be inflated by fear thoughts. 4. Do not be awestruck by other people and try to copy them. Nobody can be you as efficiently as YOU can. Remem…

Dularpur Darshan -29

What is in your Morning Routine?
Following a proper and planned morning routineis a great habit to get into and can significantly reduce morning stress and increase productivity. If you are someone who wakes up with a bit of a fuzzy head and walk around like a zombie until it's time for work, you're not really starting your day on the right way. Get out of bed and start your day with purpose, and set yourself up for the great day that lies ahead of you. Having a morning routine and knowing what you're going to do as soon as you wake up will give you more purpose and stop you from turning over and falling back asleep. How many times have you hit the alarm clock and thought 'another 15 minutes won't do any harm'? it's time to get rid of that thinking and start a new morning habit. Creating a morning routine really starts with preparing for this the night before. before you go to bed make sure you have everything prepared for you as soon as you get up. You don't…

Dularpur Darshan - 28

Ten Points for Active Prayer

Following are ten rules for getting effective results from prayer: 1. Set aside a few minutes every day. Do not say anything. Simply practice thinking about God. This will make your mind spiritually receptive. 2. Then pray orally, using simple, natural words. Tell God anything that is on your mind. Do not think you must use stereotyped pious phrases. Talk to God in your own language. He understands it. 3. Pray as you go about the business of the day, on the subway or bus or at your desk. Utilize minute prayers by closing your eyes to shut out the world and concentrating briefly on God’s presence. The more you do this every day the nearer you will feel God’s presence. 4. Do not always ask when you pray, but instead affirm that God’s blessings are being given, and spend most of your prayers giving thanks. 5. Pray with the belief that sincere prayers can reach out and surround your loved ones with God’s love and protection. 6. Never use a negative thought in prayer. …

दुलारपुर दर्शन -26

मैं और माननीय सांसद  श्री संदीप दीक्षित

दुलारपुर दर्शन-25

दुलारपुर के भूतपूर्व  सरपंच 

दुलारपुर दर्शन-24

दुलारपुर का रसलपुर मकदूम महाल
 (महाराजी दियारा )

कहा जाता है कि महाराजा दरमंगा कार्तिक मास में गंगा सेवन करने हेतु अपने मुलाजिमों के साथ गंगातट आया करते थे। गंगा सेवन की अवधि  में उन्हें अनेक कठिनाईयों का सामना करना पड़ता था। अतः उन्होंने अपनी एक जागीर खरीद ली जिसे रसलपुर मकदूम के नाम से जाना जाता है। जहाँ उनका शिविर लगता था, वह जगह अभी दुलारपुर दियारा में महाराजी नाम से प्रख्यात है। इन दिनों  दियारा का यह भू भाग  गंगा में हुए कटाव के कारण गंगा की गोद में चला गया है ।

दुलारपुर दर्शन-23

दुलारपुर का चित्रनारायण महाल 

दुलारपुर गाँव की एक बेटी नरहन स्टेट में ब्याही गयी। कहा जाता हे कि बेटी के पिता ने दुलारपुर गाँव अपनी बेटी को दान स्वरूप उसके खोइछे में दिया था। परन्तु खेतों में कृषि कार्य पिता ही करते आ रहे थे। जब नरहन स्टेट वालों ने अपनी जमीन दखल करना चाहा तो दुलारपुर के लोगों को ऐतराज हुआ और नरहन के लोगों को खेत पर से भगा दिया गया।

परन्तु कागजी मामलें मं नरहन के लोग ही सही थे। उन लोगों ने कानूनी प्रक्रिया शुरू की, तथ्य नरहन के कुछ लोगों ने प्रशासन के कहने पर दुलारपुर जाकर अपनी जमीन दखल करनी चाही। वे करीब सौ लोग नरहन से आकर वर्तमान बाया नदी के इस पार दी अपना छावनी लगाया। वे लोग अगले सुबह में खेत पर छावा बोलने जाते। राहगीरों के द्वारा दियारा में बसे दुलारपुर के लोगों को इन सारी बातों की जानकारी मिली। अतः गाँव के एक तेज एवं साहसी आदमी को वहाँ वहाँ उनके पास भेजा। वह आदमी घोड़े पर चढ़कर छावनी के बगल से ही गुजरा। वहाँ छावनी के लोगों ने उसे बुलाया और पुछा क्या तुम दुलारपुर गाँव से आ रहे हो? उसने कहा - क्या यह बताओगे कि दुलारवासी हम लोगों के आने की खबर जानते हैं। उसने कहा - ह…

Dularpur Darshan - 22

Seven wonders of Patna Patnaites have traditionally had an emotional sense of belonging. By participating overwhelmingly in the Seven Wonders of Patna, you have confirmed our conviction that landmarks in a city are more than just cultural or historical artefacts, that they anchor us to our Universe, help us build a sense of community and a unique identity.

Over the past few days we presented to you 14 fascinating stories about well-known and not-so-well-known landmarks in the city. They included monuments, bridges, places of worship and even a Biological Park. The response was fantastic, reaffirming our belief that the majority of Patnaites are committed stakeholders in our city. Eventually, the Seven Wonders of Patna were decided through your SMS and website votes, and we are happy to present the final list to you. Golghar
Golghar, a single dome structure built in the native Stupa architecture, is a unique architectural wonder. This massive and bulbous beehive of a granary was built in…

Dularpur Darshan -21

Arun Praksh ( अरुण प्रकाश )

जन्म : 22फरवरी1948 में बेगूसराय (बिहार) जिला के निपनियां गाँव में।
शिक्षा : स्नातकप्रबंध विज्ञान और पत्रकारिता में स्नातकोत्तर डिप्लोमा। प्रकाशित कृतियाँ : कहानी-संग्रह : भैया एक्सप्रेस,जलप्रांतर, मँझधारकिनारे, उस रात का दुःख, लाखों के बोल सहे,विषम राग आदि... आलोचना : गद्य की पहचान  उपन्यास : कोंपल कथा कविता-संकलन : रक्त के बारे में अनुवाद : अंग्रेजी से हिंदी में विभिन्न विषयों की आठ पुस्तकों के अनुवाद। अनुभव : अखबारों व पत्रिकाओं कासंपादन। खासकरसाहित्य अकादमी की पत्रिका'समकालीन भारतीय साहित्य' का कई  वर्षों तक संपादन।कई  धारावाहिकों,वृत्त चित्रों तथा टेली-फिल्मों के लिए लेखन से संबद्ध रहे, कई स्तंभों के लिए भीलेखन। प्राय: एक दशक से कथा-समीक्षा और कथेतर-गद्यों की आलोचना में सक्रीय थे। अनेक राष्ट्रीय स्तर की संगोष्ठियों में सहभागिता। सम्मान : साहित्यकार सम्मान, हिंदी अकादमी; दिल्ली, कृति पुरस्कार, हिंदी अकादमी; दिल्ली, रेणु पुरस्कार, बिहार शासन, दिनकर सम्मान, सुभाष चन्द्र बोस कथा-सम्मान, कृष्ण प्रताप स्मृति कथा पुरस्कार सहित कई सम्मानों से सम्मानित।
निधन : 18…

Dularpur Darshan -20

एक कहानी नहीं पूरा शोध प्रबंध है 'भैया एक्सप्रेस'

अरुण प्रकाश चले गए यूं लगा मानो भैया एक्सप्रैस पंजाब पहुंचने से पहले ही अकस्मात दुघर्टनाग्रस्त हो गया हो। उस पर सवार रामदेव अब कैसे अपने भैया विशुनदेव को खोज कर लाएगा। नवब्याही भौजी कब तक इंतजार करती रहेगी। माई कब तक कनसार में अनाज भूनकर,सत्तू पिसकर पंडितजी से लिए कर्ज का सूद भरती रहेगी। कम से कम मुझे तो यह आशा जरूर थी की अरुण प्रकाश अपने जीवन में ही पुरबियों जिसमें बिहार पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार,  झारखंड आदि के गरीब मजदूरों के साथ अन्य राज्यों में पंजाब, हरियाणा, महाराष्ट्र और उत्तर पूर्वी राज्यों में अन्याय बंद हो जाएगा। पर नहीं आज भी लाखों मजदूर अन्य प्रदेशों में रोजी-रोजगार के लिए जानवरों की भांति अनेक भैया एक्सप्रैस रेलगाड़ियों में ठुंसे चले जा रहे हैं। अमानवीय स्थितियों में काम करने को मजबूर हैं। उनका शोषण घर में निकलने के साथ जो शुरु होता है वह रेल के जनरल डब्बों में टिटियों, भेंडरों, हिजडों, कुलियों, पॉकेटमारों से लेकर जिस-जिस व्यक्तियों से साबका पड़ता है सब लूटता है। सामान्य शहरी बाबूओं को तो उनको देखते ही उबकाई आती है…

Dularpur Darshan-19

अरुण प्रकाश के अप्रकाशित उपन्यास का अंश
अरुण प्रकाश ने मिथिला-कोकिल विद्यापति के जीवन को आधार बनाकर एक उपन्यास लिखा था. जिन दिनों मैं ‘बहुवचन’ का संपादन कर रहा था उसका एक अंश भी ‘बहुवचन’ के ११ वें अंक में प्रकाशित किया था. लेकिन पता नहीं क्यों उन्होंने इस उपन्यास को प्रकाशित नहीं करवाया. असल में, अरुण प्रकाश जी परफेक्शनिस्ट थे. जब तक अपनी किसी रचना से पूरी तरह संतुष्ट नहीं हो जाते थे उसे प्रकाशित नहीं करवाते थे. ‘पूर्वराग’ नामक उस उपन्यास की एक हलकी-सी झांकी लेते हैं।

पूर्व राग
श्रृंगार में पूर्व राग होता है. विद्यापति न केवल पूर्व राग के कवि थे बल्कि वे पूर्वी प्रदेशों के राग भी थे. असमिया, ओडिया, बांग्ला और नेपाली भाषाओं में विद्यापति के पद हैं तो कई भाषाओं में उनका प्रभाव लक्षित होता है. धार्मिक मार-काट के उस दौर में वैष्णव संप्रदाय ने पूर्वी भारत की लहुलूहान आत्मा पर कोमल फाहा रखा था और उसके रस थे विद्यापति. इस उपन्यास में विद्यापति के सारे अंतरंगों के भाष्य हैं. इस प्रस्तुति में मिथिला के पक्षधर जयदेव का भाष्य है, जो आपबीती के साथ जगबीती भी सुनाते हैं.
पक्षधर भाष्य
मेरी ख्याति इस रूप म…

Dularpur Darshan-18

‘पैन इंडियन राइटर’ थे अरुण प्रकाश

परंपरा और आधुनिकता के संगम के अपूर्व शिल्‍पी, संवेदना से लबरेज और भारतीय समाज की गहरी जातीय चेतना के विशिष्‍ट चितेरे अरुण प्रकाश का हमारे बीच से यूं चले जाना हिंदी साहित्‍य के लिए प्रचलित अर्थों में रस्‍मी किस्‍म की अपूरणीय क्षति नहीं है, बल्कि सही मायनों में देखा जाए तो ऐसी क्षति है, जिसकी भरपाई मौजूदा हालात में दूर-दूर तक दिखाई नहीं देती। मैंने उन्‍हें एक सिद्धहस्‍त कथाकार ही नहीं वरन ऐसे कई रूपों में देखा-जाना है, जिन्‍हें समझे बिना असली अरुण प्रकाश को नहीं जाना जा सकता। अरुणजी हिंदी की लुप्‍त होती मसिजीवी परंपरा के विरल लेखकों में थे, जिन्‍होंने पूरा जीवन ही लेखनी के बल पर जीया। और वैसा जीवन बहुत कम लेखकों ने जीया होगा, जिसमें कभी किसी के पास न तो वे काम मांगने गये और ना ही अपनी विपन्‍नता का कभी रोना रोया। स्‍वाभिमानी लेखन की ऐसी मिसाल दुर्लभ ही मिलती है। उनकी जिंदादिली और उन्‍मुक्‍तता ऐसी थी कि कोई उस नारियल जैसे रूखे-सूखे खांटी व्‍यक्तित्‍व के भीतर छिपे कोमल श्‍वेत संसार में यदा-कदा ही दाखिल हुआ होगा और उनकी अपनी संघर्ष गाथा से परिचित हुआ होगा। उ…